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<title>حقوق خصوصی</title>
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<description>هنر استدلال</description>
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<lastBuildDate>Mon, 20 Apr 2009 18:28:50 GMT</lastBuildDate>
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<title>اخذ به شفعه</title>
<link>http://417.blogfa.com/post-52.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;A href=&quot;http://lawblog.ir/archives/2006/10/post_42/&quot;&gt;&lt;B&gt;اخذ به شفعه&lt;/B&gt;&lt;/A&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;در ایران بر خلاف کشورهای سوسیالیستی مالکیت وجود دارد . اسباب مالکیت در ایران در ماده 140 &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;قانون مدنی آمده است . یکی از این اسباب ( اخذ به شفعه ) می باشد و چون جز عقود نمی باشد در بحث &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;جدایی در قانون مدنی به آن اشاره شده است .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;کلمه شفعه از شفع به معنای جفت آمده است و در مقابل فرد قرار دارد . از آنجایی که بین 2 نفر برقرار &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;می شود به آن شفعه گوییند . شفیع نیز کسی است که دارای حق شفعه است. ماده 808 قانون مدنی : هرگاه &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;مال غیر منقول قابل تقسیمی بین دو نفر مشترک باشد و یکی از 2 شریک حصه خود را به قصد بیع به &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;شخص ثالثی منتقل کند شریک دیگر حق دارد قیمتی را که مشتری داده است به او بدهد و حصه مبیعه را &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;تملک کند . این حق را حق شفعه و صاحب آنرا شفیع نامند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;شرایط: مال یابد غیر منقول باشد که این کلمه در ماده 808 دارای مفهوم مطلق می باشد . ( در علم اصول &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;اگر کلمه با ادات جمع مانندهر همه ... بیاید عام است اما اگر بدون اینها بیاید مطلق است . اگر دارای قیدی &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;نیز بود مقید می باشد . عام در برابر خاص و مطلق در برابر معلق است ) بس در ماده 808 کلمه غیر &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;منقول مطلق است و تمام شمول آنرا در بر می گیرد . ( غیر منقول ذاتی - غیر منقول تبعی ) اما در شامل &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;اموال در حکم غیر منقول نمی شود . مثلا در گندم هایی که هنوز درو نشده و در حکم غیر منقول هستند &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;حق شفعه نداریم . حق به شفعه خلاف قاعده است زیرا اصل بر این است معامله ای که انجام شد صحیح &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;است . در چنین مواردی که حکمی خلاف قاعده داریم باید به قدر متیقن عمل کرد و به نص صریح قانون &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;مراجعه کرد . ماده 809 قانون مدنی : اگر بنا و درخت بدون زمین فروخته شود حق شفعه نحواهد بود . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;مال باید قابل تقسیم باشد . و بین دو نفر مشترک باشد . اگر مالی بین 3 نفر مشترک باشد حق شفعه وجود &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;ندارد . معامله باید بیع باشد . مثلا در صلح یا هبه و معاوضه حق شفعه نداریم. در آحرتوجه نمایید که حق &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;شفعه از حقوق مالی می باشد .&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سيري در قانون مدني با تعمق در آن حکايت از ظرافت و دقت نويسندگان آن را در تدوين احکام مدني &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دارد. اين قانون عصاره انديشه والاي فقها است در عين حال از جريانهاي سده هاي اخير و تحولات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي بيگانه در امان نمانده است ليکن اين را ما عار نمي دانيم بلکه آن را تکامل مي ناميم مشروط بر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اينکه منطبق با اصول و قواعد حقوقي بومي گردد . با وجود اين نفوذ عناوين بيگانه در قانون مدني را، &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با همه وسواسي که نويسندگان اين قانون و تعصب نسبت به گذشته غني ايران در زمينه فقه و حقوق &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;داشته اند، نمي توان انکار کرد. در تدوين بخش تعهدات نفوذ عناوين حقوقي بيگانه محسوستر است هر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چند تسلط و آشنائي فراوان نويسندگان قانون مدني سدي حصين در راه نفوذ عقايد حقوقي خارجيان است &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با اين حال رخنه آنها اجتناب ناپذير است. تأمل در مواد 199، 200، 212،213، 246، 452، 483، 496&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;، 467، 544، 626، 670، 682، 733، &lt;/B&gt;&lt;B&gt;۸۰۱&lt;/B&gt;&lt;B&gt;، 803، 816، 837، 1212 نفوذ اين عناوين آميخته با &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مسامحه گري مقنن در تدوين مواد قانوني آشکار مي شود و همين امر باعث ترديد نويسندگان حقوقي و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مجريان شده است که الفاظ مبهم و دوپهلو را بر کدام معني حمل کنند. اين مسامحه کاري عواقب مطلوبي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ندارد گاهي اوقات بطلان عقد نتيجه مي دهد گاهي صحت. با وجود اين در بعضي مواد تعابيري به چشم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مي خورد که در نگاه اول ممکن است حمل بر تسامح شود ولي با پرده گشائي از حقيقت نشان از ظرافت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نويسندگان قانون دارد. يکي از اين مواد، ماده 816 قانون مدني است. در اين ماده مي خوانيم: « اخذ به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفعه هر معامله را كه مشتري قبل از آن و بعد از عقد بيع نسبت به مورد شفعه نموده باشد، باطل مي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نمايد. »... آنچه در ماده بصورت نامتعارف جلوه مي کند قسمت اخير آن است. در اين ماده سبب بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقدي که قبل از اخذ به شفعه منعقد شده است اعمال حق شفعه توسط شفيع عنوان شده است. مي دانيم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;که در حقوق ايران اسباب بطلان بايد حين تراضي موجود باشند و الا تآثيري در عقد نخواهند داشت يا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دست کم موجب انفساخ عقد مي شود (مواد 387، 453، 483 ق.م ). چنانکه مورد معامله عين معين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;باشد و هنگاه تراضي تلف شده باشد طبق ماده 361 ق.م بيع باطل است ولي چنانچه بعد از تراضي باشد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ديگر ضمانت اجراي آن بطلان نيست بلکه بيع صحيح و نافذ است فقط در تلف قبل از تسليم يا خيار &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مختص مشتري، موجب انفساخ است. همچنين است در ماليت داشتن يا قدرت بر تسليم. در حالي که در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اين ماده اعمال حق را موجب بطلان عقد سابق مي داند. در نظام حقوقي ايران بطلان زماني به کار مي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;رود که عقد از همان حين توافق باطل باشد يا به تعبيري دقيقتر، اين توافق تلاشي باطل براي انعقاد عقد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است در اين نظام ممکن نيست عقدي صحيح واقع شود و بعد به علتي باطل شود. از طرفي در ماده 816 &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سبب بطلان عقد را اخذ به شفعه دانسته و از عبارت « باطل مي نمايد » ظهور در عارض شدن بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بعد از اعمال حق، بر عقد صحيح است همان که در نظام حقوقي ما پذيرفته نيست و منطبق با نظامهاي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي بيگانه است. توضيح اينکه در نظام حقوقي ما بطلان مطلق است و قابل استناد در برابر همه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اشخاص، بطلان نسبي عنواني بيگانه در حقوق ما است. بطلان نسبي يکي از نهادي است که مي تواند &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حکم ماده 816 قانون مدني را توجيه کند منتها با سابقه درخشان فقهي در حقوق ايران، اين لباس &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عاريتي را برانداز خود نمي دانيم و مصمم هستيم اين مواد را منطبق با قواعد و اصول حقوقي و فقهي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خود تفسير کنيم تا هيچ نيازي به تمسک به بيگانگان احساس نشود. نويسندگان حقوقي در شرح اين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ماده کمتر اشاره به قسمت آخر ماده نموده اند گوئي موءلفان مغمض ما چنان به اين شيوه مقنن خو &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;گرفته اند که توجهي به اين مسائل در قانون مدني ننموده اند و مانند ساير مواد مذکور آن را حمل بر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تسامح نموده اند آنچه حقير از آن بيزار است و اين گونه بازي با الفاظ را در خور نويسندگان تحليل گر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نمي داند. به عقيده نگارنده در مورد اين ماده هيچ گونه تسامحي صورت نگرفته است بلکه بدون نياز به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عناوين حقوق خارجي، کاملا منطبق با نظام حقوقي ما است.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آنچه در اين ماده جلب توجه مي نمايد اين است که معامله مشتري بر حصه خود از مال مشاع قبل از اخذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به شفعه آيا فاقد يکي از ارکان عقد است؟ آيا مشتري قبل از مشخص شدن وضعيت مال و تصميم شريک &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حق معامله بر آن مال را دارد؟ در صورت انعقاد عقد، آيا اين معامله باطل است يا صحيح است و بعد از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اعمال حق شفيع باطل مي شود (قابليت ابطال- بطلان نسبي)؟ يا اخذ به شفعه کاشف از بطلان اين معامله &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است؟ يا مراد انفساح آن است که با تسامح بطلان ناميده شده است؟ يا اينکه معامله غير نافذ است و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفيع با تملک حصه شريک خود آن را رد مي نمايد؟ يا معاملات شريک در برابر شفيع قابليت استناد را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ندارد؟... هر يک از اين احتمالات ممکن است در برخورد با اين ماده به ذهن برسد مضافا بر اينکه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقدانان نسبت به اين ماده کمتر نظري ارائه داده اند و شايد علت آن اختلاف شديد فقها بر اين مسئله &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;باشد با وجود اين پذيرش هر يک از اين احتمالات فقط جنبه نظري ندارد بلکه آثار عملي فراواني دارد که &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در خور توجه است... نويسنده در مقاله هر يک از فروض فوق با توجه به دلائلي که مي تواند آن را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;موجه جلوه دهد و نقد آنها، بررسي مي کند و به علت عدم طرح مفصل آنها در کتب حقوقي در حد وسع &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خود منبعي تفصيلي در نظر ندارد ( براي ديدن مباحثي در اين زمينه رجوع کنيد: مرحوم دکتر سيد حسن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;امامي. حقوق مدني جلد سوم. ص 31- دکتر ناصر کاتوزيان. ايقاع. ش 181)... در مورد اينکه آيا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مشتري مال مشاع حق دارد قبل از تصميم شريک، حصة خود را مورد معامله قرار دهد يا اينکه وي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چنين حقي ندارد، پاسخ به اين مسئله باز مي گردد به اينکه آيا خود شريک نيز حق فروش حصه خود را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به غير شريک دارد يا اينکه وي نيز چنين حقي ندارد و شريک وي در تملک اين حصه بر اجنبي مقدم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است که بعد از انصراف وي از تملک حصه شريک خود، جواز بيع آن صادر مي شود. پاسخ اين مسئله &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;روشن است و کسي ترديد در جواز و نيز صحت بيع ندارد، و با وجود ماده 813 ق.م بحث در اين زمينه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مفيد به نظر نمي رسد. اما در اينکه مشتري نيز حق معامله بر مال خود را دارد ترديدها آغاز مي شود. &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;از جهتي طبق ماده 30 ق.م هر مالک حق دارد هر گونه تصرف مشروعي در مال خود بنمايد مگر اينکه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با مانع قانوني برخورد کند در نتيجه سلب هر حقي از شخص نسبت به ما يملک خود نياز به تصريح &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;قانونگذار دارد از سوي ديگر فروش مال مشترک براي شريک در مبيع حق عيني شفعه ايجاد مي کند و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;همين حق مي تواند مانع تصرفات منافي با اين حق از طرف مالک باشد (مستنبط از مواد 793 و 794 &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ق.م). گذشته از اينکه آيا شفعه يک حق عيني در معناي خاص است يا به تعبير بعضي بايد آن را در حکم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حق عيني دانست، تمايل قانونگذار بر اينکه شريک را با خريدار نخست روبرو کند و ثمن مقرر در اولين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بيع را براي تملک در نظر بگيرد و نيز بر عهده گذاشتن ضمان درک مبيع بر عهده مشتري (ماده 817 &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ق.م)، و حکم ابطال همه معاملات مشتري در نتيجه اخذ به شفعه (ماده 816 ق.م) نشان از اين است که &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مقنن خواسته است طرف شفيع را مشتري قرار دهد نه شخص ديگر و الا مي توانست آخرين مشتري را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با شريک روبرو کند و حکم ابطلال معامله مشتري شريک را نمي داد. پس مشخص مي شود حق فروش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;براي مشتري قبل از تصميم شريک منافي با حق شفعه است در نهايت تصرفات حقوقي شريک از نفوذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي برخوردار نيست. اما پذيرش اين نظر مشکل است و با ظاهر ماده 816 ق.م نيز مخالف است &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چراکه در اين ماده از عدم نفوذ تصرفات مشتري در مبيع سخني نگفته است مضافا اينکه اخذ به شفعه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را سبب بطلان دانسته نه عدم حق تصرف در مال! مي توان دلايل اين ادعا را چنين بررسي کرد: اولا: در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;صورت عدم وجود حق تصرف به استناد حق عيني شفعه ضمانت اجراي آن بايد عدم نفوذ باشد نه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بطلان، دوما: در صورت انصراف شريک از اعمال حق خويش يا تراخي در اعمال و سقوط حق شفعه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;باز هم معامله مشتري بايد باطل باشد در صورتي که سببي براي بطلان آن نيست و قوانين نيز چنين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نپذيرفته اند و ماده 816 ق.م اخذ به شفعه را سبب باطل شدن معامله مي داند پس در صورت عدم تملک &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مال توسط شفيع و يا سقوط و اسقاط حق شفعه، چه سببي براي بطلان بايد وجود داشته باشد؟ علاوه بر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آن در قانون نيز تصرف منافي با حق شريک قبل از اعمال حق شفعه منع نشده است در صورتي که مقنن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در مواد 460 ق.م تصرف مشتري شرطي را ممنوع نموده و همين حکم را در ماده 793 ق.م در مورد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تصرف منافي حق مرتهن توسط راهن تکرار کرده است بدون اينکه در مبحث شفعه از آن سخني بگويد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حال تکليف چيست و وضعيت تصرفات مشتري قبل از سقوط حق شفعه چيست؟ سوما: از طرفي نمي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;توان وضع مشتري حصه مشترک را با مشتري بيع شرط و راهن قياس نمود چرا که محدوديت در اعمال &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حق مشتري شرطي در مدت معين است نه نا محدود، و به همين علت سلب حق تصرف وي باعث جهل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به ارزش مبيع و تضرر غير عادلانه وي نمي شود و در رهن نيز راهن مال را با اراده خويش وثيقه دين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نموده است و عدم حق تصرف وي هر چند ممکن است بصورت نا معين باشد ولي اعاده اين حق با اراده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خود راهن است که با پرداخت دين صورت مي گيرد و الا ضرر وي را مي توان مستند قاعده اقدام دانست &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و نياز به حمايتي نباشد ولي در اخذ به شفعه زمان عدم وجود حق تصرف در مبيع مشخص نيست ممکن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است شريک در دسترس نباشد و آگاه از معامله نشود و آگاهي وي نيز ميسر نشود پس در اين صورت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مشتري براي مدت نامعين حق تصرف در مبيع را ندارد و اين از ارزش مبيع مي کاهد و علاوه بر آن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ضرري است نامتعارف بر مشتري که خلاف انصاف و عدالت است و نيز چنين وضعي ممکن است مستند &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بطلان بيع قرار گيرد و از طرفي پيدايش يا اعاده حق فروش نيز بر خلاف رهن در اختيار مشتري نيست &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بلکه در اختيار شريک است. هر چند قانون فوريت را در ماده 821 ق.م براي اعمال حق شفعه در نظر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;گرفته است ولي شروع آن منوط به آگاهي شريک است، و اين شرط عقلي هر اعمال حقي است شرطي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;که زمان تحقق آن مشخص نيست و ممکن است آگاه کردن شريک نيز ميسر نباشد. چه بسا معاملات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;متعددي بر آن مال واقع شود که شريک سالياني بعد آگاه شود و بخواهد حقش را اعمال کند: خود بخوان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حديث مفصل از اين مجمل! و اگر حق تصرف براي مشتري نباشد در اين ساليان طولاني همه معاملاتش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بايد باطل باشد نظري که پذيرش آن اگر منطقي باشد وجدان حقوقي آن را نخواهد پذيرفت... پس با وجود &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اين مسائل نگارنده بر اين باور است که حق تصرف در مبيع براي مشتري قبل از اخذ به شفعه بطور &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مطلق سلب نشده است که شرح آن در نتيجه بحث خواهد آمد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;بحث صحت معامله مشتري بر مبيع و بطلان آن بوسيله اعمال حق مختصري گذشت و دليل عدم پذيرش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آن و مخالف بودن آن با اصول حقوقي ما گفته شد با اين وجود احتمالي است که بيشتر اساتيد بدون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اينکه آن را بررسي کنند موضوع حکم ماده 816 ق.م دانسته اند و نيز گفته شده است که اخذ به شفعه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مشتري را از آغاز باطل مي کند اين نظر بدين معني است که اعمال حق شريک کاشف از بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مشتري است فرضي که احتمال آن را بسيار مي رود ليکن بايد ديد آيا چنين وضعيتي را قانون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ما و اصول حقوقي پذيرفته اند. آيا مي شود که حادثه خارجي موجب بطلان عقد باشد؟ استقراء در قانون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مدني چنين صورتي را به ما نشان نميدهد، بيشترين تأثير يک حادثه خارجي در عقد انفساخ است آن هم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در شرايط استثنائي و ويژه، مانند عقود اذني و عقودي که شخصيت قيد تراضي است و ممتنع شدن دائم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اجراي عقود معوض در پاره اي موارد يا تلف قهري مال موضوع تمليک در عقود معاوضي قبل از تسليم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;: ( مواد: بند 2 م 51، 387، 453، 483، 496، 527، 529، 530، 551، بند 2 م 587، بند 2 م 588، &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;626، 628، 638، 649، 670، بند 3 م 678، 682، 683 و 954 قانون مدني – در مواد 626، 682 و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;670 ق.م بجاي واژه انفساخ به تسامح از بطلان نام مي برد ليکن اين نحوه نوشتار نبايد مستند تأئيد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نظري شود که به موجب آن عارض شدن عوامل بطلان بعد از انعقاد صحيح عقد نيز مي تواند موجب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بطلان مي شود ). پس پذيرش بطلان در عقد صحيح منجز با وقوع حادثه خارجي چه منتسب به اراده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شخص خارجي باشد چه قوه قاهره به معناي اخص باشد در قانون مدني مانندي ندارد و نه با اصول &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي مي خواند با اينحال بايد اين نظر را کمي تعديل کرد. اما آيا مي تواند اخذ به شفعه را موجب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;انفساخ معاملات مشتري دانست؟ گذشته از اينکه پديده اي ارادي، در قالب اعمال انشائي و عناوين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;قصديه با صدور از جانب غير به عبارتي ارادي بودن سبب انفساخ، مي تواند موجب منفسخ گرديدن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقدي شود، هر چند که استقراء در قانون مدني جواب منفي را خواهد گفت، بايد به مواد مربوط به حق &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفعه رجوع کرد و ديد آيا قانون آثار انفساخ را در معاملات مشتري جاري مي داند. قاطع ترين پاسخ را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ماده مورد بحث مي دهد چرا که صراحتا از بطلان معاملات مشتري بحث کرده است آثار انفساخ مانند &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مالکيت منافع براي مشتري معامله دوم و بعدي و نفوذ تصرفات حقوقي و احترام به تصرفات مادي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آثاري است که مورد پذيرش مقنن قرار نگرفته است چنانچه از نحوه تدوين احکام مربوطه هويداست هر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چند بحث انفساخ معاملات مشتري در فقه نيز طرفداراني دارد... فرض ديگري که ممکن است به ذهن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;برسد اين است که معاملات مشتري بر حصه مشاعي غير نافذ است (براي ديدن اين نظر رک مرحوم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دکتر سيد حسن امامي. حقوق مدني. جلد سوم. ص 31) و شريک با اخذ به شفعه آنها را بطور ضمني رد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مي کند و چنانچه در مدتي که بايد اعمال حق صورت بگيرد اقدام نکند يا تراخي نمايد و يا حق خود را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اسقاط کند (ماده 822 ق.م) در اين صورت شريک بطور ضمني معاملات مشتري را تنفيذ مي نمايد و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مطابق مقررات معاملات فضولي عمل مي شود. در اين فرض چند ايراد برطرف مي شود. اولين آنها &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ايراد عارض شدن بطلان بر عقد صحيح است که در اين فرض اخذ به شفعه رد معاملات مشتري است و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;موجب بطلان عقد غير نافذ مي شود که هيچ برخوردي با قواعد و اصول حقوقي نمي کند. و ايراد ديگر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حمايت از مشتري و طرفين معامله با وي است که اميدي به نفوذ تصرفات خود دارند. مبناي عدم نفوذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نيز وجود حق عيني شريک بر مبيع است که تنافي اين حق با معاملات مشتري مي تواند مانع نفوذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تصرفات مشتري باشد نظري که از اين لحاظ هيچ تعارضي با اصول حقوقي ندارد. آنچه پذيرش اين نظر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را دشوار مي نمايد دلالت اخذ به شفعه بر عمل حقوقي «رد» است. مي دانيم رد يا تنفيذ عقد يک عمل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي است که نيازمند قصد انشاء و اراده انشائي است و لازمه آن نيز التفات صاحب حق به وجود &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معامله غير نافذ است چنانچه وي ملتفت به وجود چنين معامله اي نباشد و اصلا در خاطرش نيز احتمال &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;وجود چنين عقدي نگذرد چطور مي شود عمل وي ، تنفيذ يا رد ضمني عقدي شود که روح شخص نيز از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آن با خبر نيست؟ منسوب کردن چنين وضعيتي به اراده شفيع نامتعارف است و لازمه اعمال حق وي نيز &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چنين نمي باشد. ممکن است براي توجيه اين دلالت به ماده 448 ق.م استناد شود که مقرر مي دارد: « &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سقوط تمام يا بعضي از خيارات را مي توان در ضمن عقد شرط نمود. » بدين توضيح که سقوط خيار يک &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عمل حقوقي است و بايد با التفات و آگاهي از وجود خيار انشاء شود و همانطور که اسقاط خياري بدون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آگاهي از وجود يا عدم آن ميسر است تنفيذ يا رد معامله غير نافذ بدون علم به وجود آنها نيز صحيح &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است. اين استدلال با ظاهرش فريبنده اش نمي تواند ذهن را قانع کند. هر چند اسقاط خيار يک عمل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي است و بدون آگاهي از وجود خياري مي توان آن را اسقاط کرد ليکن اين اسقاط با احتمال وجود &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خيار يا مقتضاي آن است و مسقط مي خواهد تمام نتايج و آثاري که به موجب خيار ايجاد مي شود چشم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;پوشي کند و به همين دليل است که بدون علم به وجود خيار اين اقدام را مي کند اما همين احتمال به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;وجود خيار و يا ايجاد آن در آينده کافي براي نفوذ عمل حقوقي است و از طرفي خود شخص سقوط خيار &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را انشاء مي کند در حالي که در فرض ما صاحب حق شفعه عمل رد يا تنفيذ را انشاء نمي کند بلکه عمل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مادي يا حقوقي ديگري انجام مي دهد و دلالت آن بر رد و تنفيذ نياز به قرائن قاطع دارد و از طرف ديگر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;صاحب حق ممکن است علاوه بر عدم آگاهي از وجود معاملات مشتري، احتمال وجود چنين معاملاتي را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نيز ندهد پس با چه قرينه اي مي توان رد يا تنفيذ را منسوب به اراده او نمود؟...مشابه اين بحث در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تحليل ماده 257 قانون مدني نيز مطرح مي شود در اين ماده مي خوانيم: «اگر عين مالي كه موضوع &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معامله فضولي بوده است قبل از اينكه مالك معامله فضولي را اجازه يا رد كند مورد معامله ديگر نيز &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;واقع شود مالك مي تواند هر يك از معاملات را كه بخواهد اجازه كند در اين صورت هر يك را اجازه كرده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و معاملات بعد از آن نافذ و سابق بر آن باطل خواهد بود. » در اين ماده نيز سبب بطلان معاملات اصيل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را رد معامله اول توسط مالک مي داند منتها بايد توجه داشت که مبناي اين ماده بکلي با ماده مورد بحث &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;متفاوت است چراکه در اين ماده اصيل بر مال غير معامله مي کند و اين معامله قطعا نفوذ حقوقي ندارد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ليکن در فرض ما مشتري بر حصه خود معامله مي کند و لحن نگارش ماده فوق نيز موافق با اصل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است. اما آنچه باعث تأئيد استدلالي که معاملات مشتري بر حصه خويش را غير نافذ مي داند و اخذ به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفعه رد آن، مي شود مبناي اين ماده است. سئوالي که بايد به آن پاسخ داده شود اين است که اگر رد يا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تنفيذ يک عمل حقوقي است که انشاء کننده آن بايد ملتفت به وجود معامله مورد اجازه يا رد باشد يا دست &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;کم احتمال وجود چنين قراردادي را بدهد در فرض ماده 257 ق.م که مالک معاملة اول را اجازه مي دهد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ممکن است از وجود معاملات بعدي اصيل باخبر نباشد پس چگونه اجازه معامله اصيل تنفيذ معاملات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بعدي مي شود و رد آن رد معاملات وي ! با اين وجود مبناي بطلان يا صحت معاملات اصيل بر مال غير &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نمي تواند عمل حقوقي اجازه يا رد مالک باشد. پس مبناي آن چيست؟ پاسخ تفصيلي به اين سئوال در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تحمل اين گفتار نيست فقط مي تواند در انتقاد از دلالت اخذ به شفعه بر رد معامله مشتري موثر باشد. به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نظر مي رسد مبناي صحت يا فساد معاملات اصيل اراده مالک بطور مستقيم نيست بلکه کاشفيت اجازه از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اختيار و صلاحيت اصيل يا عدم آن در معامله بر مال است چنانچه از ماده 258 ق.م استنباط مي شود که &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آثار تنفيذ عقد به گذشته باز مي گردد يکي از اين آثار اعطاي صلاحيت به اصيل است و رد معامله اصيل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;توسط مالک کاشف از عدم صلاحيت وي. پس تصميم مالک نسبت به معامله فضولي و اثر آن نسبت به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات واقع شده به همان مال، ناشي از اثر مستقيم و بيواسطه اراده مالک نمي شود که به رد يا تنفيذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ساير معاملات بر آن مال تعبير شود بلکه اعطاي صلاحيت به معامل است و مبناي صحت يا بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات اصيل بر مال غير وجود يا عدم وجود اين صلاحيت است نه تنفيذ يا رد مالک. پس با قياس اين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مورد به نظريه عدم نفوذ معاملات مشتري حصه مشاعي در رفع ايراد عدم دلالت اخذ به شفعه بر رد عقد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;غير نافذ، صحيح به نظر نمي رسد و نمي توان اين عقيده را توجيه کند. پس نظريه عدم نفوذ معاملات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مشتري نيز نمي تواند ذهن ما را قانع کند بايد به دنبال مبناي ديگري بود تا حکم ماده مورد بحث روشن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شود.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بعضي از حقوقدانان بعد از بررسي فروض مسئله و احراز فساد نظريات مذکور عقيده خود را در قالب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عدم قابليت استناد معاملات مشتري در برابر شفيع اظهار کرده اند ( استاد دکتر ناصر کاتوزيان. ايقاع. &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ايقاع معين. شفعه. ش 181. ص 287 - ش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;۱۳۷). &lt;/B&gt;&lt;B&gt;گذشته ابهام مفهوم عدم قابليت استناد به عنوان يکي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;از ضمانت اجراهاي مدني در اعمال حقوقي و نامتعارف بودن آن در نظام حقوقي ما و پذيرفته نشدن آن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به عنوان قاعده عمومي در تعهدات قراردادي، براي بکار بردن چنين عنواني نياز به صراحت قانونگذار &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;داريم بگونه اي که قرينه هاي مخالف ظني در گرايش بسوي نظرات ديگر به وجود نيآورد چنانچه ماده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;4 قانون نحوه اجراي محکوميتهاي مالي مصوب 1351 در زمان حکومت خود و نيز همان قانون مصوب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سال 1377 چنين کرد. با اين وجود به نظر مي رسد ماده 816 ق.م مدني در راستاي وضع چنين حکمي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نبوده است علاوه بر عدم صراحت اين ماده به عدم قابليت استناد معاملات شريک در برابر شفيع و گمنام &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بودن چنين ضمانت اجرائي، که جز در موارد ضرورت نبايد متمسک به آن شد، صراحت ماده در بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات شريک در نتيجه اخذ به شفعه بطور مطلق، مانع از پذيرش نظر مذکور مي شود کما اينکه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اعمال حق توسط شفيع و تأثير آن در معاملات معارض موجب ضمان مشتري بر عوض قراردادي در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;برابر طرف عقد است در واقع ضمان مشتري معاوضي است در حالي که طبق نظريه عدم قابليت استناد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در توجيه حکم ماده مورد بحث ضمان مشتري در برابر طرف معامله بايد ضمان بدلي باشد که با عبارت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;« باطل مي نمايد ( توسط اخذ به شفعه ) » منتفي مي گردد و اين حکم با بکار بردن واژه بطلان ظهور &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در ضمان معاوضي دارد و نمي توان آن را شامل ضمان بدلي يا قهري دانست. اين نظر با اينکه بسياري &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;از ايرادات حکم ماده 816 ق.م را برطرف مي نمايد نمي تواند قدرت نفوذ خود را از ظهور قوانين بگيرد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و ديگر اينکه مشخص نيست سقوط حق شفعه در عدم قابليت استناد اين معاملات چه تأثيري مي گذارد و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مبناي اين آثار چيست در نتيجه بايد دنبال مبناي ديگري براي حکم اين ماده بود.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نظر برگزيده- از آنچه گفته شد و نظرات احتمالي که در توجيه حکم ماده 816 قانون مدني مطرح شد بايد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دنبال نظري باشيم که ايرادات مطروحه را نداشته باشد علاوه بر آن با حکم ماده مورد بحث نيز تعارضي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نداشته باشد و اصول و قواعد نظام حقوقي ايران را زير پا نگذارد. آنچه حقير برگزيده است مشابه نظري &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است که اخذ به شفعه را کاشف از بطلان معاملات مشتري مي داند ليکن به اين کاشفيت صورت ديگري &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مي بخشيم و بناي ديگري را براي توجيه آن در نظر مي گيريم. به نظر مي رسد با جمع اصول بايد تمامي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مشتري بر حصه خود در مال مشاع و معاملات بعد از آن معلق باشد و معلق عليه سقوط يا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اسقاط حق شفعه توسط شفيع باشد و با تحقق اين شرط است که مطابق قواعد عقد معلق موجب صحت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقد مي شود و عدم حصول معلق عليه که همان اعمال حق شفعه توسط صاحب آن است موجب بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقد مي شود در واقع کاشفيت از بطلان عقد معلق از حين تراضي است. مي دانيم که در عقد معلق &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حصول منشأ عقد معلق بر شرطي است که با تحقق آن شرط عقد منجز مي شود و حقوق و تعهدات به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دارائي طرفين مي پيوندند و عدم تحقق آن موجود نه چندان کامل را از ابتدا نابود مي کند و موجب بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و فساد آن مي شود گوئي از از آغاز هيچ اعتباري در عالم حقوق انشاء نشده بود. اين نظر بسياري از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ايرادات و اشکالات را از بين مي برد و حکم ماده 816 ق.م را دقيقا مطابق با اصول حقوقي ما مي کند و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;هم حق شفعه شريک را محفوظ مي کند و مانع تجاوز به آن مي شود هم حق طرفين معامله مشتري در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;صورت سقوط حق شفعه حفظ مي کند و آنها را اميدوار به صحت عقد مي کند و باعث نفوذ کامل آن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مي شود و هم رفع ضرر از مشتري و اطراف آن عقود را ممکن مي سازد و نيز از اجراي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حکمي غير عادلانه جلوگيري مي کند: آنچه وجدان حقوقي را خشنود مي سازد. اين نظر را در توجيه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ماده 460 قانون مدني نيز مي توان در راستاي اجراي عدالت اظهار داشت. اين ماده مي گويد: « در بيع &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شرط مشتري نمي تواند در مبيع تصرفي كه منافي خيار باشد از قبيل نقل و انتقال و غيره بنمايد. » ظاهر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اين ماده از عدم وجود حق تصرفات حقوقي براي مشتري شرطي است هر چند تا پايان مدت بايع استرداد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مبيع را نخواهد و اقدام به فسخ نکند ( البته اين عقيده در معاملات با حق استرداد موضوع قانون ثبت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;قابليت اجرا ندارد ). نظر برگزيده ما هم مي تواند مقصود مقنن در تدوين اين احکام را تأمين کند بدون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اينکه کوچکترين تعارضي با آن داشته باشد و هم مي تواند حقوق کساني که نسبت به آن معامله نموده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اند حفظ کند و از ورود ضرر ناروا به آنها جلوگيري کند و هم هيچ تعارضي با اصول حقوقي ندارد. &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 20 Apr 2009 18:28:50 GMT</pubDate>
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<dc:creator>417</dc:creator>
<guid>http://417.blogfa.com/post-52.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>اخذ به شفعه</title>
<link>http://417.blogfa.com/post-51.aspx</link>
<description>&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;A href=&quot;http://lawblog.ir/archives/2006/10/post_42/&quot;&gt;اخذ به شفعه&lt;/A&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در ایران بر خلاف کشورهای سوسیالیستی مالکیت وجود دارد . اسباب مالکیت در ایران در ماده 140 &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;قانون مدنی آمده است . یکی از این اسباب ( اخذ به شفعه ) می باشد و چون جز عقود نمی باشد در بحث &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;جدایی در قانون مدنی به آن اشاره شده است .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;کلمه شفعه از شفع به معنای جفت آمده است و در مقابل فرد قرار دارد . از آنجایی که بین 2 نفر برقرار &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;می شود به آن شفعه گوییند . شفیع نیز کسی است که دارای حق شفعه است. ماده 808 قانون مدنی : هرگاه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مال غیر منقول قابل تقسیمی بین دو نفر مشترک باشد و یکی از 2 شریک حصه خود را به قصد بیع به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شخص ثالثی منتقل کند شریک دیگر حق دارد قیمتی را که مشتری داده است به او بدهد و حصه مبیعه را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تملک کند . این حق را حق شفعه و صاحب آنرا شفیع نامند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شرایط: مال یابد غیر منقول باشد که این کلمه در ماده 808 دارای مفهوم مطلق می باشد . ( در علم اصول &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اگر کلمه با ادات جمع مانندهر همه ... بیاید عام است اما اگر بدون اینها بیاید مطلق است . اگر دارای قیدی &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نیز بود مقید می باشد . عام در برابر خاص و مطلق در برابر معلق است ) بس در ماده 808 کلمه غیر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;منقول مطلق است و تمام شمول آنرا در بر می گیرد . ( غیر منقول ذاتی - غیر منقول تبعی ) اما در شامل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اموال در حکم غیر منقول نمی شود . مثلا در گندم هایی که هنوز درو نشده و در حکم غیر منقول هستند &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حق شفعه نداریم . حق به شفعه خلاف قاعده است زیرا اصل بر این است معامله ای که انجام شد صحیح &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است . در چنین مواردی که حکمی خلاف قاعده داریم باید به قدر متیقن عمل کرد و به نص صریح قانون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مراجعه کرد . ماده 809 قانون مدنی : اگر بنا و درخت بدون زمین فروخته شود حق شفعه نحواهد بود . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مال باید قابل تقسیم باشد . و بین دو نفر مشترک باشد . اگر مالی بین 3 نفر مشترک باشد حق شفعه وجود &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ندارد . معامله باید بیع باشد . مثلا در صلح یا هبه و معاوضه حق شفعه نداریم. در آحرتوجه نمایید که حق &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt;شفعه از حقوق مالی می باشد .&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سيري در قانون مدني با تعمق در آن حکايت از ظرافت و دقت نويسندگان آن را در تدوين احکام مدني &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دارد. اين قانون عصاره انديشه والاي فقها است در عين حال از جريانهاي سده هاي اخير و تحولات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي بيگانه در امان نمانده است ليکن اين را ما عار نمي دانيم بلکه آن را تکامل مي ناميم مشروط بر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اينکه منطبق با اصول و قواعد حقوقي بومي گردد . با وجود اين نفوذ عناوين بيگانه در قانون مدني را، &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با همه وسواسي که نويسندگان اين قانون و تعصب نسبت به گذشته غني ايران در زمينه فقه و حقوق &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;داشته اند، نمي توان انکار کرد. در تدوين بخش تعهدات نفوذ عناوين حقوقي بيگانه محسوستر است هر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چند تسلط و آشنائي فراوان نويسندگان قانون مدني سدي حصين در راه نفوذ عقايد حقوقي خارجيان است &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با اين حال رخنه آنها اجتناب ناپذير است. تأمل در مواد 199، 200، 212،213، 246، 452، 483، 496&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;، 467، 544، 626، 670، 682، 733، &lt;/B&gt;&lt;B&gt;۸۰۱&lt;/B&gt;&lt;B&gt;، 803، 816، 837، 1212 نفوذ اين عناوين آميخته با &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مسامحه گري مقنن در تدوين مواد قانوني آشکار مي شود و همين امر باعث ترديد نويسندگان حقوقي و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مجريان شده است که الفاظ مبهم و دوپهلو را بر کدام معني حمل کنند. اين مسامحه کاري عواقب مطلوبي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ندارد گاهي اوقات بطلان عقد نتيجه مي دهد گاهي صحت. با وجود اين در بعضي مواد تعابيري به چشم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مي خورد که در نگاه اول ممکن است حمل بر تسامح شود ولي با پرده گشائي از حقيقت نشان از ظرافت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نويسندگان قانون دارد. يکي از اين مواد، ماده 816 قانون مدني است. در اين ماده مي خوانيم: « اخذ به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفعه هر معامله را كه مشتري قبل از آن و بعد از عقد بيع نسبت به مورد شفعه نموده باشد، باطل مي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نمايد. »... آنچه در ماده بصورت نامتعارف جلوه مي کند قسمت اخير آن است. در اين ماده سبب بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقدي که قبل از اخذ به شفعه منعقد شده است اعمال حق شفعه توسط شفيع عنوان شده است. مي دانيم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;که در حقوق ايران اسباب بطلان بايد حين تراضي موجود باشند و الا تآثيري در عقد نخواهند داشت يا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دست کم موجب انفساخ عقد مي شود (مواد 387، 453، 483 ق.م ). چنانکه مورد معامله عين معين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;باشد و هنگاه تراضي تلف شده باشد طبق ماده 361 ق.م بيع باطل است ولي چنانچه بعد از تراضي باشد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ديگر ضمانت اجراي آن بطلان نيست بلکه بيع صحيح و نافذ است فقط در تلف قبل از تسليم يا خيار &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مختص مشتري، موجب انفساخ است. همچنين است در ماليت داشتن يا قدرت بر تسليم. در حالي که در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اين ماده اعمال حق را موجب بطلان عقد سابق مي داند. در نظام حقوقي ايران بطلان زماني به کار مي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;رود که عقد از همان حين توافق باطل باشد يا به تعبيري دقيقتر، اين توافق تلاشي باطل براي انعقاد عقد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است در اين نظام ممکن نيست عقدي صحيح واقع شود و بعد به علتي باطل شود. از طرفي در ماده 816 &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سبب بطلان عقد را اخذ به شفعه دانسته و از عبارت « باطل مي نمايد » ظهور در عارض شدن بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بعد از اعمال حق، بر عقد صحيح است همان که در نظام حقوقي ما پذيرفته نيست و منطبق با نظامهاي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي بيگانه است. توضيح اينکه در نظام حقوقي ما بطلان مطلق است و قابل استناد در برابر همه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اشخاص، بطلان نسبي عنواني بيگانه در حقوق ما است. بطلان نسبي يکي از نهادي است که مي تواند &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حکم ماده 816 قانون مدني را توجيه کند منتها با سابقه درخشان فقهي در حقوق ايران، اين لباس &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عاريتي را برانداز خود نمي دانيم و مصمم هستيم اين مواد را منطبق با قواعد و اصول حقوقي و فقهي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خود تفسير کنيم تا هيچ نيازي به تمسک به بيگانگان احساس نشود. نويسندگان حقوقي در شرح اين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ماده کمتر اشاره به قسمت آخر ماده نموده اند گوئي موءلفان مغمض ما چنان به اين شيوه مقنن خو &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;گرفته اند که توجهي به اين مسائل در قانون مدني ننموده اند و مانند ساير مواد مذکور آن را حمل بر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تسامح نموده اند آنچه حقير از آن بيزار است و اين گونه بازي با الفاظ را در خور نويسندگان تحليل گر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نمي داند. به عقيده نگارنده در مورد اين ماده هيچ گونه تسامحي صورت نگرفته است بلکه بدون نياز به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عناوين حقوق خارجي، کاملا منطبق با نظام حقوقي ما است.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آنچه در اين ماده جلب توجه مي نمايد اين است که معامله مشتري بر حصه خود از مال مشاع قبل از اخذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به شفعه آيا فاقد يکي از ارکان عقد است؟ آيا مشتري قبل از مشخص شدن وضعيت مال و تصميم شريک &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حق معامله بر آن مال را دارد؟ در صورت انعقاد عقد، آيا اين معامله باطل است يا صحيح است و بعد از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اعمال حق شفيع باطل مي شود (قابليت ابطال- بطلان نسبي)؟ يا اخذ به شفعه کاشف از بطلان اين معامله &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است؟ يا مراد انفساح آن است که با تسامح بطلان ناميده شده است؟ يا اينکه معامله غير نافذ است و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفيع با تملک حصه شريک خود آن را رد مي نمايد؟ يا معاملات شريک در برابر شفيع قابليت استناد را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ندارد؟... هر يک از اين احتمالات ممکن است در برخورد با اين ماده به ذهن برسد مضافا بر اينکه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقدانان نسبت به اين ماده کمتر نظري ارائه داده اند و شايد علت آن اختلاف شديد فقها بر اين مسئله &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;باشد با وجود اين پذيرش هر يک از اين احتمالات فقط جنبه نظري ندارد بلکه آثار عملي فراواني دارد که &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در خور توجه است... نويسنده در مقاله هر يک از فروض فوق با توجه به دلائلي که مي تواند آن را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;موجه جلوه دهد و نقد آنها، بررسي مي کند و به علت عدم طرح مفصل آنها در کتب حقوقي در حد وسع &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خود منبعي تفصيلي در نظر ندارد ( براي ديدن مباحثي در اين زمينه رجوع کنيد: مرحوم دکتر سيد حسن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;امامي. حقوق مدني جلد سوم. ص 31- دکتر ناصر کاتوزيان. ايقاع. ش 181)... در مورد اينکه آيا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مشتري مال مشاع حق دارد قبل از تصميم شريک، حصة خود را مورد معامله قرار دهد يا اينکه وي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چنين حقي ندارد، پاسخ به اين مسئله باز مي گردد به اينکه آيا خود شريک نيز حق فروش حصه خود را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به غير شريک دارد يا اينکه وي نيز چنين حقي ندارد و شريک وي در تملک اين حصه بر اجنبي مقدم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است که بعد از انصراف وي از تملک حصه شريک خود، جواز بيع آن صادر مي شود. پاسخ اين مسئله &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;روشن است و کسي ترديد در جواز و نيز صحت بيع ندارد، و با وجود ماده 813 ق.م بحث در اين زمينه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مفيد به نظر نمي رسد. اما در اينکه مشتري نيز حق معامله بر مال خود را دارد ترديدها آغاز مي شود. &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;از جهتي طبق ماده 30 ق.م هر مالک حق دارد هر گونه تصرف مشروعي در مال خود بنمايد مگر اينکه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با مانع قانوني برخورد کند در نتيجه سلب هر حقي از شخص نسبت به ما يملک خود نياز به تصريح &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;قانونگذار دارد از سوي ديگر فروش مال مشترک براي شريک در مبيع حق عيني شفعه ايجاد مي کند و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;همين حق مي تواند مانع تصرفات منافي با اين حق از طرف مالک باشد (مستنبط از مواد 793 و 794 &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ق.م). گذشته از اينکه آيا شفعه يک حق عيني در معناي خاص است يا به تعبير بعضي بايد آن را در حکم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حق عيني دانست، تمايل قانونگذار بر اينکه شريک را با خريدار نخست روبرو کند و ثمن مقرر در اولين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بيع را براي تملک در نظر بگيرد و نيز بر عهده گذاشتن ضمان درک مبيع بر عهده مشتري (ماده 817 &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ق.م)، و حکم ابطال همه معاملات مشتري در نتيجه اخذ به شفعه (ماده 816 ق.م) نشان از اين است که &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مقنن خواسته است طرف شفيع را مشتري قرار دهد نه شخص ديگر و الا مي توانست آخرين مشتري را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;با شريک روبرو کند و حکم ابطلال معامله مشتري شريک را نمي داد. پس مشخص مي شود حق فروش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;براي مشتري قبل از تصميم شريک منافي با حق شفعه است در نهايت تصرفات حقوقي شريک از نفوذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي برخوردار نيست. اما پذيرش اين نظر مشکل است و با ظاهر ماده 816 ق.م نيز مخالف است &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چراکه در اين ماده از عدم نفوذ تصرفات مشتري در مبيع سخني نگفته است مضافا اينکه اخذ به شفعه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را سبب بطلان دانسته نه عدم حق تصرف در مال! مي توان دلايل اين ادعا را چنين بررسي کرد: اولا: در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;صورت عدم وجود حق تصرف به استناد حق عيني شفعه ضمانت اجراي آن بايد عدم نفوذ باشد نه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بطلان، دوما: در صورت انصراف شريک از اعمال حق خويش يا تراخي در اعمال و سقوط حق شفعه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;باز هم معامله مشتري بايد باطل باشد در صورتي که سببي براي بطلان آن نيست و قوانين نيز چنين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نپذيرفته اند و ماده 816 ق.م اخذ به شفعه را سبب باطل شدن معامله مي داند پس در صورت عدم تملک &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مال توسط شفيع و يا سقوط و اسقاط حق شفعه، چه سببي براي بطلان بايد وجود داشته باشد؟ علاوه بر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آن در قانون نيز تصرف منافي با حق شريک قبل از اعمال حق شفعه منع نشده است در صورتي که مقنن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در مواد 460 ق.م تصرف مشتري شرطي را ممنوع نموده و همين حکم را در ماده 793 ق.م در مورد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تصرف منافي حق مرتهن توسط راهن تکرار کرده است بدون اينکه در مبحث شفعه از آن سخني بگويد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حال تکليف چيست و وضعيت تصرفات مشتري قبل از سقوط حق شفعه چيست؟ سوما: از طرفي نمي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;توان وضع مشتري حصه مشترک را با مشتري بيع شرط و راهن قياس نمود چرا که محدوديت در اعمال &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حق مشتري شرطي در مدت معين است نه نا محدود، و به همين علت سلب حق تصرف وي باعث جهل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به ارزش مبيع و تضرر غير عادلانه وي نمي شود و در رهن نيز راهن مال را با اراده خويش وثيقه دين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نموده است و عدم حق تصرف وي هر چند ممکن است بصورت نا معين باشد ولي اعاده اين حق با اراده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خود راهن است که با پرداخت دين صورت مي گيرد و الا ضرر وي را مي توان مستند قاعده اقدام دانست &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و نياز به حمايتي نباشد ولي در اخذ به شفعه زمان عدم وجود حق تصرف در مبيع مشخص نيست ممکن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است شريک در دسترس نباشد و آگاه از معامله نشود و آگاهي وي نيز ميسر نشود پس در اين صورت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مشتري براي مدت نامعين حق تصرف در مبيع را ندارد و اين از ارزش مبيع مي کاهد و علاوه بر آن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ضرري است نامتعارف بر مشتري که خلاف انصاف و عدالت است و نيز چنين وضعي ممکن است مستند &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بطلان بيع قرار گيرد و از طرفي پيدايش يا اعاده حق فروش نيز بر خلاف رهن در اختيار مشتري نيست &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بلکه در اختيار شريک است. هر چند قانون فوريت را در ماده 821 ق.م براي اعمال حق شفعه در نظر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;گرفته است ولي شروع آن منوط به آگاهي شريک است، و اين شرط عقلي هر اعمال حقي است شرطي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;که زمان تحقق آن مشخص نيست و ممکن است آگاه کردن شريک نيز ميسر نباشد. چه بسا معاملات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;متعددي بر آن مال واقع شود که شريک سالياني بعد آگاه شود و بخواهد حقش را اعمال کند: خود بخوان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حديث مفصل از اين مجمل! و اگر حق تصرف براي مشتري نباشد در اين ساليان طولاني همه معاملاتش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بايد باطل باشد نظري که پذيرش آن اگر منطقي باشد وجدان حقوقي آن را نخواهد پذيرفت... پس با وجود &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اين مسائل نگارنده بر اين باور است که حق تصرف در مبيع براي مشتري قبل از اخذ به شفعه بطور &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مطلق سلب نشده است که شرح آن در نتيجه بحث خواهد آمد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;بحث صحت معامله مشتري بر مبيع و بطلان آن بوسيله اعمال حق مختصري گذشت و دليل عدم پذيرش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آن و مخالف بودن آن با اصول حقوقي ما گفته شد با اين وجود احتمالي است که بيشتر اساتيد بدون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اينکه آن را بررسي کنند موضوع حکم ماده 816 ق.م دانسته اند و نيز گفته شده است که اخذ به شفعه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مشتري را از آغاز باطل مي کند اين نظر بدين معني است که اعمال حق شريک کاشف از بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مشتري است فرضي که احتمال آن را بسيار مي رود ليکن بايد ديد آيا چنين وضعيتي را قانون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ما و اصول حقوقي پذيرفته اند. آيا مي شود که حادثه خارجي موجب بطلان عقد باشد؟ استقراء در قانون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مدني چنين صورتي را به ما نشان نميدهد، بيشترين تأثير يک حادثه خارجي در عقد انفساخ است آن هم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در شرايط استثنائي و ويژه، مانند عقود اذني و عقودي که شخصيت قيد تراضي است و ممتنع شدن دائم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اجراي عقود معوض در پاره اي موارد يا تلف قهري مال موضوع تمليک در عقود معاوضي قبل از تسليم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;: ( مواد: بند 2 م 51، 387، 453، 483، 496، 527، 529، 530، 551، بند 2 م 587، بند 2 م 588، &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;626، 628، 638، 649، 670، بند 3 م 678، 682، 683 و 954 قانون مدني – در مواد 626، 682 و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;670 ق.م بجاي واژه انفساخ به تسامح از بطلان نام مي برد ليکن اين نحوه نوشتار نبايد مستند تأئيد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نظري شود که به موجب آن عارض شدن عوامل بطلان بعد از انعقاد صحيح عقد نيز مي تواند موجب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بطلان مي شود ). پس پذيرش بطلان در عقد صحيح منجز با وقوع حادثه خارجي چه منتسب به اراده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شخص خارجي باشد چه قوه قاهره به معناي اخص باشد در قانون مدني مانندي ندارد و نه با اصول &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي مي خواند با اينحال بايد اين نظر را کمي تعديل کرد. اما آيا مي تواند اخذ به شفعه را موجب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;انفساخ معاملات مشتري دانست؟ گذشته از اينکه پديده اي ارادي، در قالب اعمال انشائي و عناوين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;قصديه با صدور از جانب غير به عبارتي ارادي بودن سبب انفساخ، مي تواند موجب منفسخ گرديدن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقدي شود، هر چند که استقراء در قانون مدني جواب منفي را خواهد گفت، بايد به مواد مربوط به حق &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفعه رجوع کرد و ديد آيا قانون آثار انفساخ را در معاملات مشتري جاري مي داند. قاطع ترين پاسخ را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ماده مورد بحث مي دهد چرا که صراحتا از بطلان معاملات مشتري بحث کرده است آثار انفساخ مانند &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مالکيت منافع براي مشتري معامله دوم و بعدي و نفوذ تصرفات حقوقي و احترام به تصرفات مادي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آثاري است که مورد پذيرش مقنن قرار نگرفته است چنانچه از نحوه تدوين احکام مربوطه هويداست هر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چند بحث انفساخ معاملات مشتري در فقه نيز طرفداراني دارد... فرض ديگري که ممکن است به ذهن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;برسد اين است که معاملات مشتري بر حصه مشاعي غير نافذ است (براي ديدن اين نظر رک مرحوم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دکتر سيد حسن امامي. حقوق مدني. جلد سوم. ص 31) و شريک با اخذ به شفعه آنها را بطور ضمني رد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مي کند و چنانچه در مدتي که بايد اعمال حق صورت بگيرد اقدام نکند يا تراخي نمايد و يا حق خود را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اسقاط کند (ماده 822 ق.م) در اين صورت شريک بطور ضمني معاملات مشتري را تنفيذ مي نمايد و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مطابق مقررات معاملات فضولي عمل مي شود. در اين فرض چند ايراد برطرف مي شود. اولين آنها &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ايراد عارض شدن بطلان بر عقد صحيح است که در اين فرض اخذ به شفعه رد معاملات مشتري است و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;موجب بطلان عقد غير نافذ مي شود که هيچ برخوردي با قواعد و اصول حقوقي نمي کند. و ايراد ديگر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حمايت از مشتري و طرفين معامله با وي است که اميدي به نفوذ تصرفات خود دارند. مبناي عدم نفوذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نيز وجود حق عيني شريک بر مبيع است که تنافي اين حق با معاملات مشتري مي تواند مانع نفوذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تصرفات مشتري باشد نظري که از اين لحاظ هيچ تعارضي با اصول حقوقي ندارد. آنچه پذيرش اين نظر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را دشوار مي نمايد دلالت اخذ به شفعه بر عمل حقوقي «رد» است. مي دانيم رد يا تنفيذ عقد يک عمل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي است که نيازمند قصد انشاء و اراده انشائي است و لازمه آن نيز التفات صاحب حق به وجود &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معامله غير نافذ است چنانچه وي ملتفت به وجود چنين معامله اي نباشد و اصلا در خاطرش نيز احتمال &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;وجود چنين عقدي نگذرد چطور مي شود عمل وي ، تنفيذ يا رد ضمني عقدي شود که روح شخص نيز از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آن با خبر نيست؟ منسوب کردن چنين وضعيتي به اراده شفيع نامتعارف است و لازمه اعمال حق وي نيز &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;چنين نمي باشد. ممکن است براي توجيه اين دلالت به ماده 448 ق.م استناد شود که مقرر مي دارد: « &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سقوط تمام يا بعضي از خيارات را مي توان در ضمن عقد شرط نمود. » بدين توضيح که سقوط خيار يک &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عمل حقوقي است و بايد با التفات و آگاهي از وجود خيار انشاء شود و همانطور که اسقاط خياري بدون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آگاهي از وجود يا عدم آن ميسر است تنفيذ يا رد معامله غير نافذ بدون علم به وجود آنها نيز صحيح &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است. اين استدلال با ظاهرش فريبنده اش نمي تواند ذهن را قانع کند. هر چند اسقاط خيار يک عمل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حقوقي است و بدون آگاهي از وجود خياري مي توان آن را اسقاط کرد ليکن اين اسقاط با احتمال وجود &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;خيار يا مقتضاي آن است و مسقط مي خواهد تمام نتايج و آثاري که به موجب خيار ايجاد مي شود چشم &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;پوشي کند و به همين دليل است که بدون علم به وجود خيار اين اقدام را مي کند اما همين احتمال به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;وجود خيار و يا ايجاد آن در آينده کافي براي نفوذ عمل حقوقي است و از طرفي خود شخص سقوط خيار &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را انشاء مي کند در حالي که در فرض ما صاحب حق شفعه عمل رد يا تنفيذ را انشاء نمي کند بلکه عمل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مادي يا حقوقي ديگري انجام مي دهد و دلالت آن بر رد و تنفيذ نياز به قرائن قاطع دارد و از طرف ديگر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;صاحب حق ممکن است علاوه بر عدم آگاهي از وجود معاملات مشتري، احتمال وجود چنين معاملاتي را &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نيز ندهد پس با چه قرينه اي مي توان رد يا تنفيذ را منسوب به اراده او نمود؟...مشابه اين بحث در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تحليل ماده 257 قانون مدني نيز مطرح مي شود در اين ماده مي خوانيم: «اگر عين مالي كه موضوع &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معامله فضولي بوده است قبل از اينكه مالك معامله فضولي را اجازه يا رد كند مورد معامله ديگر نيز &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;واقع شود مالك مي تواند هر يك از معاملات را كه بخواهد اجازه كند در اين صورت هر يك را اجازه كرده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و معاملات بعد از آن نافذ و سابق بر آن باطل خواهد بود. » در اين ماده نيز سبب بطلان معاملات اصيل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;را رد معامله اول توسط مالک مي داند منتها بايد توجه داشت که مبناي اين ماده بکلي با ماده مورد بحث &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;متفاوت است چراکه در اين ماده اصيل بر مال غير معامله مي کند و اين معامله قطعا نفوذ حقوقي ندارد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ليکن در فرض ما مشتري بر حصه خود معامله مي کند و لحن نگارش ماده فوق نيز موافق با اصل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است. اما آنچه باعث تأئيد استدلالي که معاملات مشتري بر حصه خويش را غير نافذ مي داند و اخذ به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شفعه رد آن، مي شود مبناي اين ماده است. سئوالي که بايد به آن پاسخ داده شود اين است که اگر رد يا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تنفيذ يک عمل حقوقي است که انشاء کننده آن بايد ملتفت به وجود معامله مورد اجازه يا رد باشد يا دست &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;کم احتمال وجود چنين قراردادي را بدهد در فرض ماده 257 ق.م که مالک معاملة اول را اجازه مي دهد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ممکن است از وجود معاملات بعدي اصيل باخبر نباشد پس چگونه اجازه معامله اصيل تنفيذ معاملات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بعدي مي شود و رد آن رد معاملات وي ! با اين وجود مبناي بطلان يا صحت معاملات اصيل بر مال غير &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نمي تواند عمل حقوقي اجازه يا رد مالک باشد. پس مبناي آن چيست؟ پاسخ تفصيلي به اين سئوال در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;تحمل اين گفتار نيست فقط مي تواند در انتقاد از دلالت اخذ به شفعه بر رد معامله مشتري موثر باشد. به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نظر مي رسد مبناي صحت يا فساد معاملات اصيل اراده مالک بطور مستقيم نيست بلکه کاشفيت اجازه از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اختيار و صلاحيت اصيل يا عدم آن در معامله بر مال است چنانچه از ماده 258 ق.م استنباط مي شود که &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;آثار تنفيذ عقد به گذشته باز مي گردد يکي از اين آثار اعطاي صلاحيت به اصيل است و رد معامله اصيل &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;توسط مالک کاشف از عدم صلاحيت وي. پس تصميم مالک نسبت به معامله فضولي و اثر آن نسبت به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات واقع شده به همان مال، ناشي از اثر مستقيم و بيواسطه اراده مالک نمي شود که به رد يا تنفيذ &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ساير معاملات بر آن مال تعبير شود بلکه اعطاي صلاحيت به معامل است و مبناي صحت يا بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات اصيل بر مال غير وجود يا عدم وجود اين صلاحيت است نه تنفيذ يا رد مالک. پس با قياس اين &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مورد به نظريه عدم نفوذ معاملات مشتري حصه مشاعي در رفع ايراد عدم دلالت اخذ به شفعه بر رد عقد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;غير نافذ، صحيح به نظر نمي رسد و نمي توان اين عقيده را توجيه کند. پس نظريه عدم نفوذ معاملات &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مشتري نيز نمي تواند ذهن ما را قانع کند بايد به دنبال مبناي ديگري بود تا حکم ماده مورد بحث روشن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شود.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بعضي از حقوقدانان بعد از بررسي فروض مسئله و احراز فساد نظريات مذکور عقيده خود را در قالب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عدم قابليت استناد معاملات مشتري در برابر شفيع اظهار کرده اند ( استاد دکتر ناصر کاتوزيان. ايقاع. &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ايقاع معين. شفعه. ش 181. ص 287 - ش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;۱۳۷). &lt;/B&gt;&lt;B&gt;گذشته ابهام مفهوم عدم قابليت استناد به عنوان يکي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;از ضمانت اجراهاي مدني در اعمال حقوقي و نامتعارف بودن آن در نظام حقوقي ما و پذيرفته نشدن آن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;به عنوان قاعده عمومي در تعهدات قراردادي، براي بکار بردن چنين عنواني نياز به صراحت قانونگذار &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;داريم بگونه اي که قرينه هاي مخالف ظني در گرايش بسوي نظرات ديگر به وجود نيآورد چنانچه ماده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;4 قانون نحوه اجراي محکوميتهاي مالي مصوب 1351 در زمان حکومت خود و نيز همان قانون مصوب &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;سال 1377 چنين کرد. با اين وجود به نظر مي رسد ماده 816 ق.م مدني در راستاي وضع چنين حکمي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نبوده است علاوه بر عدم صراحت اين ماده به عدم قابليت استناد معاملات شريک در برابر شفيع و گمنام &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;بودن چنين ضمانت اجرائي، که جز در موارد ضرورت نبايد متمسک به آن شد، صراحت ماده در بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات شريک در نتيجه اخذ به شفعه بطور مطلق، مانع از پذيرش نظر مذکور مي شود کما اينکه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اعمال حق توسط شفيع و تأثير آن در معاملات معارض موجب ضمان مشتري بر عوض قراردادي در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;برابر طرف عقد است در واقع ضمان مشتري معاوضي است در حالي که طبق نظريه عدم قابليت استناد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در توجيه حکم ماده مورد بحث ضمان مشتري در برابر طرف معامله بايد ضمان بدلي باشد که با عبارت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;« باطل مي نمايد ( توسط اخذ به شفعه ) » منتفي مي گردد و اين حکم با بکار بردن واژه بطلان ظهور &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;در ضمان معاوضي دارد و نمي توان آن را شامل ضمان بدلي يا قهري دانست. اين نظر با اينکه بسياري &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;از ايرادات حکم ماده 816 ق.م را برطرف مي نمايد نمي تواند قدرت نفوذ خود را از ظهور قوانين بگيرد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و ديگر اينکه مشخص نيست سقوط حق شفعه در عدم قابليت استناد اين معاملات چه تأثيري مي گذارد و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مبناي اين آثار چيست در نتيجه بايد دنبال مبناي ديگري براي حکم اين ماده بود.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نظر برگزيده- از آنچه گفته شد و نظرات احتمالي که در توجيه حکم ماده 816 قانون مدني مطرح شد بايد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دنبال نظري باشيم که ايرادات مطروحه را نداشته باشد علاوه بر آن با حکم ماده مورد بحث نيز تعارضي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;نداشته باشد و اصول و قواعد نظام حقوقي ايران را زير پا نگذارد. آنچه حقير برگزيده است مشابه نظري &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;است که اخذ به شفعه را کاشف از بطلان معاملات مشتري مي داند ليکن به اين کاشفيت صورت ديگري &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مي بخشيم و بناي ديگري را براي توجيه آن در نظر مي گيريم. به نظر مي رسد با جمع اصول بايد تمامي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مشتري بر حصه خود در مال مشاع و معاملات بعد از آن معلق باشد و معلق عليه سقوط يا &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اسقاط حق شفعه توسط شفيع باشد و با تحقق اين شرط است که مطابق قواعد عقد معلق موجب صحت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقد مي شود و عدم حصول معلق عليه که همان اعمال حق شفعه توسط صاحب آن است موجب بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;عقد مي شود در واقع کاشفيت از بطلان عقد معلق از حين تراضي است. مي دانيم که در عقد معلق &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حصول منشأ عقد معلق بر شرطي است که با تحقق آن شرط عقد منجز مي شود و حقوق و تعهدات به &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;دارائي طرفين مي پيوندند و عدم تحقق آن موجود نه چندان کامل را از ابتدا نابود مي کند و موجب بطلان &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;و فساد آن مي شود گوئي از از آغاز هيچ اعتباري در عالم حقوق انشاء نشده بود. اين نظر بسياري از &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ايرادات و اشکالات را از بين مي برد و حکم ماده 816 ق.م را دقيقا مطابق با اصول حقوقي ما مي کند و &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;هم حق شفعه شريک را محفوظ مي کند و مانع تجاوز به آن مي شود هم حق طرفين معامله مشتري در &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;صورت سقوط حق شفعه حفظ مي کند و آنها را اميدوار به صحت عقد مي کند و باعث نفوذ کامل آن &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;معاملات مي شود و هم رفع ضرر از مشتري و اطراف آن عقود را ممکن مي سازد و نيز از اجراي &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;حکمي غير عادلانه جلوگيري مي کند: آنچه وجدان حقوقي را خشنود مي سازد. اين نظر را در توجيه &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;ماده 460 قانون مدني نيز مي توان در راستاي اجراي عدالت اظهار داشت. اين ماده مي گويد: « در بيع &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;شرط مشتري نمي تواند در مبيع تصرفي كه منافي خيار باشد از قبيل نقل و انتقال و غيره بنمايد. » ظاهر &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اين ماده از عدم وجود حق تصرفات حقوقي براي مشتري شرطي است هر چند تا پايان مدت بايع استرداد &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;مبيع را نخواهد و اقدام به فسخ نکند ( البته اين عقيده در معاملات با حق استرداد موضوع قانون ثبت &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;قابليت اجرا ندارد ). نظر برگزيده ما هم مي تواند مقصود مقنن در تدوين اين احکام را تأمين کند بدون &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اينکه کوچکترين تعارضي با آن داشته باشد و هم مي تواند حقوق کساني که نسبت به آن معامله نموده &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;B&gt;اند حفظ کند و از ورود ضرر ناروا به آنها جلوگيري کند و هم هيچ تعارضي با اصول حقوقي ندارد. &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT size=1&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 20 Apr 2009 18:25:54 GMT</pubDate>
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<title></title>
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<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;زندگی یعنی جاری بودن تا ناکجا و عشق یعنی ناکجا &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;آباد.هدف زندگی پرواز با بال رنگین کمان است تا اوج &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;رسیدن&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&lt;A href=&quot;http://groups.yahoo.com/group/marshall-modern/join&quot; target=_blank&gt;&lt;IMG alt=&quot;Hosted by FreeImageHosting.net Free Image Hosting Service&quot; src=&quot;http://img2.freeimagehosting.net/uploads/ed6865f86e.jpg&quot;&gt;&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=5&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 23 Nov 2006 10:19:52 GMT</pubDate>
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<item>
<title>بازگشت به عقب یا اجرای قانون</title>
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<description>&lt;P class=MsoNormal style=&quot;TEXT-JUSTIFY: inter-ideograph; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;COLOR: black; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;شهروندان حق دارند هنگام مراجعه به دستگاه قضايى با برخوردى يكسان در تفسير و تعبير قانون روبه&amp;nbsp;رو شوند. قضات همانند آحاد مردم ماشين مكانيكى نيستند و در مورد سكوت يا ابهام قانون و چگونگى اجراى آن با توجه به موقعيت فكرى و اجتماعى خود تصميم&amp;nbsp;هاى گوناگون مى&amp;nbsp;گيرند. پس ممكن است اجراى يك ماده قانونى در دو دادگاه مختلف با دو شيوه اجرا و تصميم روبه&amp;nbsp;رو شود. قانونگذار آگاه، براى ايجاد وحدت رويه در تفسير قانون، راهكارى را پيش&amp;nbsp;بينى كرده و با ايجاد «هيات عمومى وحدت رويه ديوان&amp;nbsp;عالى كشور» مركب از قضات آن مرجع حكم نموده است كه در موارد اختلافى و صدور احكام متناقض از دادگاه&amp;nbsp;ها در مورد مشابه، تصميم اين هيات رافع اختلاف بوده و پس از صدور راى هيات عمومى تصميم اين مرجع مانند قانون براى دادگاه&amp;nbsp;ها الزام&amp;nbsp;آور و اتخاذ تصميم خلاف آن ممنوع است. اين سازوكار فرصتى است براى قضات مجرب تا بدون پيچ و خم&amp;nbsp;هاى قانونگذارى و فارغ از نهاد نظارتى و جايى كه اشكالات اجرايى قانون مشخص شده با راى خود پيشرفت حقوق را موجب شوند و نقص عملى و نظرى قانون را رفع نمايند. در تاريخ ۱۳/۱۰/۸۴ ديوان عالى كشور در راى شماره ۶۸۳ خود فرصت مغتنم جهت گام نهادن در مسير عدالت را به هدر داده است. موضوع از اين قرار است كه طبق ماده ۳۰۱ قانون مجازات اسلامى ديه زن هنگامى كه از يك سوم تجاوز نمايد نصف مرد است. از سوى ديگر نهاد ديگرى جهت جبران خسارت در قانون مجازات اسلامى پيش&amp;nbsp;بينى شده كه ارش نام دارد و تعيين آن در مواردى است كه طبق شرع اسلامى ديه خاص مشخص نشده است. به همين دليل تعيين ارش به عهده قضات قرار گرفته است و طريق محاسبه نيز با مقياس ديه صورت مى&amp;nbsp;پذيرد كه با توجه به تورم و لزوم محاسبه با شاخص زمان پرداخت قابل ستايش است. نصف نمودن ديه زن از جمله مباحثات نظرى و دغدغه&amp;nbsp;هاى عملى قبل از انقلاب است و خودى و بيگانه در اين مسير قلم&amp;nbsp;زنى و عيب&amp;nbsp;جويى نمودند. رويه قضايى ناچار است حكم قانون در مورد ديه را به هر شكل اجرا كند اما قضات يكى از شعب دادگاه&amp;nbsp;هاى پژوهش استان آذربايجان غربى، هوشمندانه از سكوت قانون در مورد تسرى اين حكم به ارش استفاده كرده و آن را مخصوص ديه دانسته&amp;nbsp;اند. اينان هنگام بررسى رايى از دادگاه شهرستان خوى اعلام نموده&amp;nbsp;اند كه چون در داد&amp;nbsp;نامه براى زنى سى درصد ديه و بيست درصد ارش تعيين شده و ديه تعيينى كمتر از يك&amp;nbsp;سوم ديه كامل است و قاعده نصف نمودن مخصوص ديه است نه ارش، لزومى براى تنصيف نبوده و زن مستحق پنجاه درصد ديه كامل تعيين شده است. قضات شعبه ديگرى از شعبه&amp;nbsp;اى ديگر در همان استان با تفسير خشك خود از قانون مجموع ديه و ارش را جهت تعيين حد&amp;nbsp; نصاب، تجاوز از يك&amp;nbsp;سوم، جهت تنصيف در نظر گرفته و به محض فراتر رفتن مجموع ديه و ارش از يك سوم آن را نصف نموده&amp;nbsp;اند. به لحاظ بروز اختلاف دادگاه&amp;nbsp;ها در تفسير امر مشابه، موضوع در هيات عمومى ديوان&amp;nbsp;عالى طرح شده و اكثريت قضات به نفع نظر دوم اتخاذ تصميم نموده&amp;nbsp;اند. با اين راى كه در حكم قانون است از اين پس اطاعت از قاعده جمع&amp;nbsp;كردن ديه و ارش، واجب است و بهترين فرصتى كه جهت تعديل قاعده تنصيف وجود داشت هدر رفته مى&amp;nbsp;نمايد. با خود مى&amp;nbsp;انديشيم اگر بتوان نصف بودن ارث زن نسبت به مرد را متكى به نص دانست و غير&amp;nbsp;قابل عدول شمرد و يا بتوان به استناد مهريه و نفقه آن را توجيه فكرى كرد، قاعده تنصيف ديه زن از چنين استحكامى برخوردار نيست و به فرض كه باشد آن را مى&amp;nbsp;توان تفسير محدود كرده در خصوص جمع ديه و ارش به كار نبرد. بايد از قضات ديوان عالى به عنوان عالى&amp;nbsp;منصبان دستگاه قضا پرسيد كه آيا هنگام اظهار نظر حقوقى آن هم در عالى&amp;nbsp;ترين مرجع نبايد گوشه چشمى به تحولات اجتماعى داشت؟ حتى اگر فمينيست نباشيم و كاملاً حقوقى به مسائل نگاه كنيم، بايد دست قضاتى را بفشاريم كه نهاد سنتى ديه را به گونه&amp;nbsp;اى تفسير و تعبير مى&amp;nbsp;كنند كه چهره جبران خسارتى آن بر چهره مجازاتى غلبه كند كه اگر چنين شود ديه نه تنها نهادى كهنه و منسوخ نيست بلكه جنبه&amp;nbsp;هايى از آن قابليت برابرى با نهادهاى حقوق مدرن را دارد. افسوس كه قضات ديوان عالى كشور با داشتن امكان برداشتن گامى بلند در رفع عيوب اين نهاد به سادگى از آن غفلت ورزيده و رايى صادر نموده&amp;nbsp;اند كه از هر دو جنبه حقوقى و اجتماعى قابل انتقاد مى&amp;nbsp;نمايد. اينجاست كه با خود مى&amp;nbsp;گوييم اى كاش چنين رايى صادر نشده بود تا قضات جوان و جسور مى&amp;nbsp;توانستند با فكر ظريف خود قاعده عدم جمع ديه و ارش را هنگام بحث تنصيف ديه رعايت كنند. به حكم هيات عمومى ديوان عالى اين امكان از اين پس منتفى است و هرگونه اصلاح نيازمند قانون مجلس، تاييد شوراى نگهبان و هزار پيچ و خم ديگر است. انتقادها از نهاد ديه دوچندان خواهد شد. حقوق در اين مسير گامى به عقب برداشته است.&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-fareast-language: EN-US; mso-ansi-language: EN-US&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;نظر شما در این مورد چیست آیا موافق هستید یا نه؟؟؟&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: lime; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-fareast-language: EN-US; mso-ansi-language: EN-US&quot;&gt;دوستدار شما....محمد&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;</description>
<pubDate>Sat, 08 Jul 2006 10:11:15 GMT</pubDate>
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<title> منتسکیو</title>
<link>http://417.blogfa.com/post-48.aspx</link>
<description>&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;&lt;A class=extiw title=w:منتسکیو href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/ÙÙØªØ³Ú©ÛÙ&quot;&gt;منتسکیو&lt;/A&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;&quot;سکوت، گاه هزار معنی دربردارد که از گفتن به دست نمی‌آید.&quot; &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV class=editsection style=&quot;FLOAT: left; MARGIN-RIGHT: 5px&quot;&gt;[&lt;A title=&quot;Edit section: شارل مونتسکیو = Montesquieu&quot; href=&quot;http://fa.wikiquote.org/w/index.php?title=%D9%85%D9%86%D8%AA%D8%B3%DA%A9%DB%8C%D9%88&amp;amp;action=edit&amp;amp;section=1&quot;&gt;ویرایش&lt;/A&gt;]&lt;/DIV&gt;
&lt;P&gt;&lt;A name=.D8.B4.D8.A7.D8.B1.D9.84_.D9.85.D9.88.D9.86.D8.AA.D8.B3.DA.A9.DB.8C.D9.88_.3D_Montesquieu&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;H2&gt;شارل مونتسکیو = Montesquieu&lt;/H2&gt;
&lt;P&gt;«بارون دلا برد منتسکیو» (1) نویسنده و فیلسوف فرانسوی، متولد 18.01.1689 میلادی در «بردو»(2) و متوفا به سال 10.02.1755 میلادی در پاریس. منتسکیو پس از اتمام تحصیلات خود در رشته های علوم انسانی و حقوق، در سال 1714 میلادی به عضویت شورای پارلمان و از 1716 تا 1726 به ریاست مجلس و دادگاه بردو انتخاب شد. به اکثر کشورهای اروپائی مسافرت کرد و به مدت دو سال در انگلستان اقامت گزید. در پایان عمر بینائی خود را کاملأ از دست داد.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;آزادی عبارت از این است که شخص مجبور نباشد برخلاف مقررات قانون کاری انجام دهد. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;باید آزادی را موقتأ از دست داد تا بتوان برای همشیه آن را حفظ نمود. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;بشری که حق اظهار عقیده و بیان فکر خود را نداشته باشد موجودی زنده محسوب نمی شود. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;کشور در صورتی دارای آزادی و استقلال است که افرادش آزاد و مستقل باشند. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;هراندازه که علل طبیعی، انسان را به استراحت سوق دهد به همان اندازه هم عوامل اخلاقی باید او را از استراحت دور کند. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;همیشه قضایا را قبل از اخذ تصمیم به محکمه وجدان تسلیم کنید، وجدان راهنمای بی نظیر و قاضی بی طرفی است. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;وقتی ثروت های بزرگ به دست افراد مردم می افتد در پرتو آن نیرومند می شوند و در سایه نیرومندی و ثروت خیال می کنند که می توانند در خارج از وطن خود زندگی نمایند و خوشبخت و سرافراز باشند ولی به زودی می فهمند که اشتباه کرده اند و عظمت هر ملتی بر روی خرابه های وطن خودش می باشد و بس. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;کسی اجازه ندارد خود را بکشد، و اگر کشت به این طریق وجود خود را از میهن خود دزدیده است. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;یک ساعت از عمر گذشته را به هیچ قیمتی نمی توان بازگردانید، اما با دادن چند قطعه پول ناچیز می توان تجارب تمام عمر بزرگترین عقلای عالم را تصرف کرد. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;من هیچ غمی نداشته ام که خواندن یک صفحه کتاب آن را از بین نبرده باشد. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;UL&gt;
&lt;LI&gt;مطالعه کتاب یعنی تبدیل ساعت های ملالت بار به ساعات لذت بخش. &lt;/LI&gt;&lt;/UL&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Wed, 05 Jul 2006 07:51:09 GMT</pubDate>
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<item>
<title>هدف</title>
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<description>&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 20pt; COLOR: blue; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;انسانی که نمی داند برای چه زندگی می کند آرزو می کنم بمیرد&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 20pt; COLOR: blue; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 20pt; COLOR: blue; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;چون لااقل می داند برای چه می میرد&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 20pt; COLOR: blue; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 20pt; COLOR: blue; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;IMG src=&quot;http://www.harmonytalk.com/images/cohen21.jpg&quot;&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 12 Jun 2006 01:01:52 GMT</pubDate>
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<item>
<title>مهارت های یادگیری</title>
<link>http://417.blogfa.com/post-44.aspx</link>
<description>&lt;FONT color=#ff9933 size=5&gt;راههای مقابله با فراموشی و بهسازی حافظه&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=text&gt;
&lt;P&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;برای بهسازي حافظه و كاستن از ميزان فراموشي بايد مطالب يادگيري را به صورت معني دار آموخت و محتواي حافظه خود را سازمان داد .&lt;BR&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;1- سازماندهي :&lt;/B&gt; يكي از مشكلات عمده در راه يادگيري از عوامل فراموشي ، جابجايي اطلاعات و قاطي شدن اطلاعات در يكديگر است . در صورت تنظيم و سازماندهي اطلاعات، اين عامل مخرب از بين رفته و حافظه انسجام كافي پيدا مي كند. در ضمن مي توان با تلاش اندكي ، ميزان بسيار زيادي اطلاعات را از حافظه بدست آورد.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;2-استفاده از واسطه‌ها:&lt;/B&gt;&lt;SPAN lang=en-us&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;يك راه براي معنا بخشيدن به مطالب ظاهرا&amp;nbsp; بي معنا استفاده از واسطه‌ها يا ميانجي‌ها است.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;3- ساخت سلسله مراتبي مطالب : &lt;/B&gt;عناصر يا تكاليف يادگيري را مي توان به صورت يك سلسله مراتب از ساده به دشوار مرتب كرد به نحوي كه يادگيري هر عنصر يا تكليف به يادگيري تكاليف ديگر مربوط باشد فايده اين عمل اين است كه يادگيرنده، يادگيري خود را با مطالب ساده آغاز مي كند و با يادگيري هر مطلب پيش نياز براي يادگيري مطالب بعدي آمادگي كسب مي كند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;وجود پيش نياز يادگيري براي هر مطلب تازه آن مطلب را به حالت آشنا و معني دار براي يادگيرنده در مي آورد . &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;4- الگوي يادگيري فعال :&lt;/B&gt; با استفاده از اين الگو مي توان ياد داري مطالب آموخته شده را طولاني تر كرد .چنين فعاليتي باعث خواهد شد كه ارتباطهاي بيشتري ما بين مطالب آموختني بر قرار شود كه بدين طريق آنها بهتر رمز گرداني خواهند شد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;الف ) يادگيري بخش بخش :&lt;/B&gt; منظور از اين روش اين است كه مطالب زياد به بخشهاي كوچكتري تقسيم شود چرا كه با اين روش قسمتهاي قبلي مطالب در تسلط آموخته مي شوند و يادگيرنده پس از يادگيري هر قسمت به سراغ قسمت بعدي خواهد رفت .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;ب) پر آموزي :&lt;/B&gt; براي مقابله با مشكل فراموشي از فرد خواسته مي شود كه مطالب آموخته شده را تكرار كند . بدين طريق اطلاعات بيشتر تثبيت خواهند شد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;ج)تمرين و مرور ذهني: &lt;/B&gt;مرور ذهني به تكرار بخش كوچكي از اطلاعات گفته مي شود كه بلافاصله بعد از رسيدن آن به حافظه كوتاه مدت صورت مي گيرد و باعث باقي ماندن اطلاعات در حافظه كوتاه مدت مي شود .&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;5- بسط اطلاعات :&lt;/B&gt; در بسط دادن مطالب ، به اطلاعات تازه و نو ، از طريق ربط دادن آنها به اطلاعات حافظه دراز مدت ، معني مي بخشيم ، براي اين كار لازم است به روابط منطقي ما بين مواد و مطالب توجه كنيد و مواد و محتواي مطالب را به تجربيات خود ربط دهيد اطلاعات و ايده‌هاي كلي را در ذهن خود ترسيم كنيد و ايده‌هاي جديد را به مطالب از قبل دانسته خود ربط دهيد و وقايع را در ذهنتان ببينيد و بشنويد .&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;6- تدابير ياد يار :&lt;/B&gt; تكنيكهايي كه به ما،&amp;nbsp; در به ياد آوردن آنچه حفظ كرده ايم كمك مي كند تدابير يا وسايل ياد يار ناميده مي شوند. در تكنيك‌هاي تدابير ياد يار از تصوير سازي ذهني استفاده فراواني به عمل مي آيد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;الف ) تصوير سازي ذهني :&lt;/B&gt; در هنگام خواندن مطالب سعي كنيد تصوير ذهني از آن براي خود بسازيد و در صورت امكان عملا&quot; آن را انجام دهيد اگر بتوانيد تصاوير مطالب خوانده شده را در ذهن ايجاد كنيد خيلي راحت تر مي توانيد آنها را بخاطر بسپاريد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;ب ) روش قافيه سازي :&lt;/B&gt; در اين شيوه بايد به طور آهنگين و با استفاده از مواد و مطالب آموزشي ، وزن و راههاي مقابله با فراموشي و بهسازي حافظه 4 آهنگ خاصي به آنها ببخشيد و بدين طريق يادگيري و يادآوري آنها را آسانتر سازيد .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;ج) روش مكان يابي :&lt;/B&gt; در اين شيوه بايد به هنگام يادآوري مطالب ، مكان اشياء را در ذهن مجسم نمائيد . مكانهاي انتخاب شده بايد برايتان كاملا&quot; آشنا باشند تا ياد آوري آنها به سهولت انجام گيرد .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;د ) روش كلمه آويز :&lt;/B&gt; بدين منظور فرد بايستي ليستي از كلمات هم وزن و قافيه را حفظ كند و پس از آن ما بين كلمات ليست و موادي كه مي خواهد آنها را به حافظه بسپارد. ارتباط برقرار كند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;ر ) روش كلمه كليد : &lt;/B&gt;در اين روش با استفاده از يك كلمه آشنا ، دو كلمه را به هم ربط داده و آنان را به طور معنا دار به حافظه بسپاريد براي يادگيري زبانهاي خارجي اين شيوه بسيار مفيد است .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;ز ) روش تقطيع :&lt;/B&gt; با استفاده از اين روش مي توان اطلاعات را به واحدهاي كوچك تقسيم بندي كرد . مثلا&quot; براي به ياد سپردن يك عدد 12 رقمي مي توان آن را به 3 دسته 4 رقمي تقسيم كرد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;و ) روش اكرونيم و آكروستيك :&lt;/B&gt; اكرونيم‌ها نشانه‌هاي حروفي هستند كه فرد با استفاده از آنها مطالب راههاي مقابله با فراموشي و بهسازي حافظه 5 نسبتا&quot; پيچيده اي را به خاطر مي آورد مثل ( يونسكو unesco ). در اكروستيك‌ها از واژگان يا جملاتي استفاده به عمل مي آيد كه حروف يا حرف اول هر واژه نشان دهنده آن ماده اطلاعاتي است كه بايد به خاطر سپرده شود .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;هـ ) روش داستان سازي براي خود: &lt;/B&gt;اگر يك ليست از مواد غير مربوط به هم داشته باشيد و بخواهيد آنها را حفظ كرده و بعدا&quot; به خاطر بياوريد مي توان براي پيوند دادن ما بين مواد ليست از روش داستان سازي استفاده كنيد.&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 25 May 2006 16:21:23 GMT</pubDate>
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<item>
<title>سلام دوست گلم....نظرتون در مورد یه شبه پولدار شدن چیه؟؟؟</title>
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<description>&lt;IMG src=&quot;http://photos.bravenet.com/462/100/211/454C62D5FA.gif&quot;&gt; </description>
<pubDate>Tue, 16 May 2006 01:04:18 GMT</pubDate>
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<title> </title>
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<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;بروکراسی(کاغذ بازی) در نظام اداری&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; size=3&gt;&amp;nbsp;&lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;«مرخص»ی واژه یست که در اصل از ریشه ی« مرقص»ی گرفته شده است به معنای« به رقص در آمده » &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;.و اما پیشینه ی تاریخی:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;در روزگار گذشته اگر خدایی نکرده کسی گیرش به دستگاه اداری و کارهای اداری می افتاد اینقدر باید در بدر می گردید .و باید حتما روی مبارک چندین هزار نفر را می دید تا اینکه بعد از زحمت های فراوان و رنج و مشقت های بسیار سر انجام کارش یا حل می شد یا نمی شد و در صورت اول که اگر قضیه تمام &lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;می شد اون بنده خدا از فرط خوشحالی و شعف و تعجب به رقص در می آمد اینجا بود که ادیبان نقذ پرداز می گفتند او از کار اداری مرقص شده است (یعنی از تمام شدن آن به رقص در آمده است).البته از همین نوع است کلماتی مانند ترخیص (رقصاندن) رخصت(برقصم)و.... بر این مقال می توان انواع رشوات(رشوه ها) و زیر میزی ها را افزود (برای زودتر به رقص در آمدن....آخه نه اینکه مردم ما عاشق رقصند برای اون)...در مباحث بعدی سعی می کنم در مورد هنر اختلاس و پولشویی و پیشینه ی تاریخی آن اطلاعات مفیدی در اختیار شما بذارم.....پس تابعد&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 07 May 2006 03:37:18 GMT</pubDate>
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<title>مشاور اجرایی وزیر دادگستری در امور مجلس منصوب شد</title>
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&lt;TD colSpan=2&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR id=trNewsTitle&gt;
&lt;TD colSpan=2&gt;&lt;SPAN class=news_title id=lblTitle dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR id=trNewsLead&gt;
&lt;TD colSpan=2&gt;&lt;SPAN class=news_lead id=lblLead dir=rtl&gt;جمال کریمی راد وزیر دادگستری، امروز یکشنبه در حکمی حجت الاسلام جعفر فتحعلی زاده را به سمت مشاور اجرایی خود در امور مجلس منصوب کرد.&lt;/SPAN&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR id=trNewsBody&gt;
&lt;TD colSpan=2&gt;&lt;SPAN class=news_body id=lblBody innerhtml=&quot;html&quot;&gt;
&lt;P align=right&gt;به گزارش خبرنگار پارلمانی &quot;مهر&quot;، این انتصاب در پی دستور رئیس قوه قضائیه و با توجه به تعهد و شایستگی و تجارب فتحعلی زاده در امور پارلمانی، فرهنگی و تبلیغی و با عنایت به لزوم ارتباط و تعامل مناسب قوای قضائیه و مقننه صورت گرفته است.&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;ایجاد ارتباط مناسب با نمایندگان مجلس&amp;nbsp;، اطلاع رسانی منظم و عملی از فعالیت های قوه قضائیه، انعکاس مطالبات قوه قضائیه به نمایندگان ملت و کمیسیون های تخصصی در راستای پیشبرد برنامه های توسعه قضایی، پیگیری موثر در خصوص درخواست های نمایندگان مرتبط با برنامه های توسعه قضایی و مشکلات حوزه های انتخابیه مربوطه و تشکیل گروههای کاری تخصصی جهت تبیین و تشریح برنامه های توسعه قضایی با مشارکت نمایندگان ملت، از وظایف مشاور اجرایی وزیر دادگستری در امور مجلس بر شمرده شده است.&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;</description>
<pubDate>Mon, 24 Apr 2006 01:08:55 GMT</pubDate>
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